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Showing posts from 2018

वज़ूद

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हिंदी दिवस

*जिस देश में हिंदी के लिए 2 दबाना पड़त हो जिस देश मे न्यायलयो से न्याय अग्रेजी भाषा मे मिलता हो जिस देश केअधिकाश स्कूलो मे पढाई का माध्यम अग्रेजी हो जिस देश मे अस्वस्थ व्यक्ति का उपचार एवं जाॅचे अग्रेजी मे हो  और जिस देश मे 90% लोग अंग्रेजी में हस्ताक्षर करते हो..*  *उस देश को* *हिंदी_दिवस की शुभकामनाएं !!* 😟😟😟

आसान नहीं होता

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हाल ही में अपनी मां को देखने जाना हुआ। उम्र के सातवें दशक को पार करने की दहलीज पर खड़ी कैंसर ग्रस्त और अकेलेपन से जूझते जीवन को क्या तसल्ली दूँ???? संयुक्त परिवार से भरे पूरे घर में सबकी ज़रूरतों का ख़याल रखते हुए जिसे कभी कभी अपने बच्चों को भी भरपूर वक़्त देना नसीब न हुआ उस मन के अकेलेपन की छटपटाहट को कौन समझ पायेगा??           

सन्नाटा

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मां को समर्पित

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लगता है..... सांकल खड़काई  किसी ने, सोचती है हर आहट पर, कमज़ोर हड्डियों पर  लुढ़कती हुई, उठने की क़वायद करती हुई.... मां ॥ खुले आंगन का लहकता सूरज तपा गया । सांसे चढ़ आईं ।। धप्प !! घुटनों ने वहीँ डेरा डाल दिया, ............आँखो ने देहरी पर । कब सांझ उतर आई पता ही न चला ।। सांकल......... फ़िर खड़की है, ऊंघती आंखें.... फ़िर चमकी हैं ।। मां....... समझना ही नहीं चाहती । वीरान घरों में तो बस्स... हवा सरसराती है ॥
नमस्कार एवं स्वागत दोस्तों!! यह ब्लॉग दुनिया की आधी आबादी के नाम है। कवि - श्री  राज्यवर्द्धन जी द्वारा 24 अगस्त'2018 को रचित कविता हम सबको समर्पित है... *स्त्रियां जब खिलखिलाती हैं* -------------------------------- धरती ठहर जाती है घूमते हुए और सुनने लगती है- स्त्रियों की हँसी जब कभी भी , जहाँ कहीं भी  पृथ्वी पर सुनाई पड़ती है। धरती माता के कान थक गए हैं स्त्रियों की सिसकियां  और चीख सुनते सुनते  सदियों से। स्त्रियां तुम हँसो ,ठिठोली करो हर वह अवसर की तलाश में रहो जब खिलखिला सको। स्त्रियां जब खिलखिलाती हैं पृथ्वी का दुःख तब कम हो जाता है!           **********  लंबे समय से एक हिंदी भाषी मंच कीं आवश्यकता महसूस हो रही थी मुझे; जो विशेषतः उस वर्ग के लिए हो जिनकी आवाज़ यहां मुखर हो उठे। यहां उपरोक्त कविता इस उद्देश्य को सार्थक करती है।  मेरा अनुरोध उन सभी लोगों से है जो मेरी बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हों और समय समय पर अपने अनुभव, ज़िन्दगी से जुड़े किस्से, कहानियां, कविताएं, संस्मरण इत्या...