मां को समर्पित

लगता है.....
सांकल खड़काई  किसी ने,
सोचती है हर आहट पर,
कमज़ोर हड्डियों पर  लुढ़कती हुई,
उठने की क़वायद करती हुई....
मां ॥

खुले आंगन का
लहकता सूरज तपा गया ।
सांसे चढ़ आईं ।।

धप्प !!
घुटनों ने वहीँ डेरा डाल दिया,
............आँखो ने देहरी पर ।
कब सांझ उतर आई
पता ही न चला ।।

सांकल.........
फ़िर खड़की है,
ऊंघती आंखें.... फ़िर चमकी हैं ।।
मां.......
समझना ही नहीं चाहती ।

वीरान घरों में तो बस्स...
हवा सरसराती है ॥

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